दरिंदे मुकेश की फांसी पर 'सुप्रीम' मुहर, अक्षय की 'बेतुकी' अर्जी पर सुनवाई आज

निर्भया के एक गुनहगार मुकेश सिंह की फांसी की सजा से बचने की आखिरी चाल भी ध्वस्त हो गई। दया याचिका ठुकराने के राष्ट्रपति के फैसले को चुनौती देने वाली मुकेश की याचिका खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति के फैसले को सही ठहराया।


 

जस्टिस आर भानुमति की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ पीठ ने कहा, राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका पर जल्द विचार करने और इसे फौरन नामंजूर करने का मतलब यह नहीं है कि उन्होंने अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया या फिर यह पूर्वाग्रह से प्रेरित था।

पीठ ने 25 पन्नों के अपने फैसले में कहा, दया याचिका पर विचार से पहले दोषियों के पिछले आपराधिक इतिहास, उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति और अदालतों द्वारा दिए गए फैसलों समेत सभी दस्तावेज राष्ट्रपति के समक्ष विचार के लिए लाए गए थे।

वहीं, अब एक और दोषी अक्षय ठाकुर ने एक फरवरी को तय की गई फांसी की तारीख से तीन दिन पहले सुप्रीम कोर्ट में सुधारात्मक याचिका दी है, जिस पर पांच जजों की पीठ बृहस्पतिवार को सुनवाई करेगी।

इससे पहले मुकेश की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस भानुमति, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एएस बोपन्ना की पीठ ने अपने 25 पन्नों के फैसले में कहा, गृह मंत्रालय ने 15 जनवरी को दिल्ली सरकार की ओर से सील बंद लिफाफे में मिले सभी दस्तावेज दया याचिका के साथ राष्ट्रपति के सामने विचार के लिए रखे थे।

इसमें निचली अदालत, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसले भी शामिल थे। जेल में कथित तौर पर यातना दिया जाना संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत पारित किए गए कार्यकारी फैसलों की न्यायिक समीक्षा का आधार नहीं हो सकता है।

इस अनुच्छेद के तहत कुछ मामलों में राष्ट्रपति को क्षमा करने और सजा को लंबित रखने, छूट देने या फिर इसे कम करने की शक्ति प्राप्त है। नतीजतन हमें मुकेश की दया याचिका खारिज करने के राष्ट्रपति के फैसले की न्यायिक समीक्षा का कोई आधार नहीं मिला। यह याचिका खारिज किए जाने लायक है।